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कीर्तनात रंग भरू पुन्हा पुन्हा

 कीर्तनात रंग भरू पुन्हा पुन्हा 

धर्म यही आधार (संघ गीत)

धर्म यही आधार।  त्रिकालदर्शी मनीषियोंसे  सिध्द हुआ संस्कार.... धर्म यही आधार।  मनुज का धर्म यही आधार ।। आज देखते विश्वपटल पर देवासुर का भीषण संगर नीलकंठ हो कर जनशंकर धर्म खड़ा है अविचल भूपर बना कूर्म अवतार ।। इससे जनमन का हो पोषण अर्थ काम का जनहित नियमन ईशसृष्टि मे सबका धारण धरती का सम्यक् संधारण उदात्त लोकाचार ।। कुटुंब बिंदु धर्मसिंधु का धर्म अक्ष एकात्म दृष्टि का शासन के हर न्याय नीति का धर्म मर्म अध्यात्म सृष्टी का समस्त जीवोद्धार ।। सहस्रशीर्षा दिव्य पुरुष की स्वयं मूर्त बन संघभाव की करें स्थापना धर्मदेव की रक्षा करने पूत धरा की एकत्रित उच्चार ।।