कैलास-मानसरोवर तीर्थयात्रा (बिपाशा शर्मा, शुभ्रा शिवांगी, अंजनी और आनंद शिंत्रे)

 

कैलास-मानसरोवर तीर्थयात्रा

(यात्रेकरू : बिपाशा शर्मा, शुभ्रा शिवांगी, अंजनी और आनंद शिंत्रे)

शब्दांकन  श्रीकांत पट्टलवार 


ॐ नमः शिवाय। 

भगवान शंकर का स्थायी निवास स्थान कैलास पर्वत और ब्रह्मा द्वारा अपने मन से निर्मित मानसरोवर की परिक्रमा, परमेश्वर में श्रद्धा रखने वालों के लिए जीवन की सर्वोच्च यात्रा है। यह यात्रा पर्यटन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक तीर्थयात्रा है। वहाँ जाने के लिए आवश्यक तैयारी स्वयं एक तपस्या के समान है। इस र्थयात्रा को सफलतापूर्वक पूर्ण करने वाले कुछ पुण्यवान मित्रों के रोमांचकारी और दिव्य अनुभव पाठकों तक पहुँचें, इसी उद्देश्य से इस शब्दरूपी यात्रा का एक प्रयास।

तिब्बत के पठार पर हजारों फीट की ऊँचाई पर स्थित विरल ऑक्सीजन वाला वातावरण, उससे श्वास-प्रश्वास पर होने वाला प्रभाव, तथा अप्रत्याशित रूप से होने वाली हिमवर्षा के कारण यह यात्रा अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण होती है।

 


परिक्रमा मार्ग 

वास्तविक कैलास परिक्रमा तीन दिनों की होती है, फिर भी विरल वातावरण के अनुकूल होने के लिए इसे चरणबद्ध तरीके से किया जाता है। इस कारण पूरी यात्रा लगभग १५-१६ दिनों की हो जाती है। काठमांडू में पशुपतिनाथ के दर्शन करके ल्हासा - सागा, मानसरोवर; प्रत्येक स्थान पर २-२ दिन रुकते हुए श्री कैलास की दिशा में आगे बढ़ते हैं। मानसरोवर की एक प्रदक्षिणा करके श्री कैलास के पादप्रदेश में स्थित ४०५७५ मीटर ऊँचे दारचेन पहुँचकर २-३ दिन का विश्राम करते हैं। आगे दिरापुख से श्री कैलास शिखर को चरणस्पर्श कर ३६ किलोमीटर की पद-परिक्रमा प्रारंभ होती है।

ब्रह्मा ने इस क्षेत्र की रचना एक कमल पुष्प के समान की है। चारों ओर दो वृत्तों में पंखुड़ियों की तरह बिखरे हुए ऊँचे-ऊँचे हिमाच्छादित पर्वत और बीच में कैलास शिखर। इस संरचना के कारण श्री कैलास की बाह्य और आंतरिक, ऐसे दो प्रकार से परिक्रमा की जा सकती है। बारह बाह्य परिक्रमाएँ करने के बाद ही आंतरिक परिक्रमा की अनुमति मिलती है, क्योंकि वह और भी अधिक कठिन है।

यात्रा के प्रत्येक पड़ाव पर प्रतिदिन सुबह शारीरिक स्वास्थ्य के लिए योगासन, ऑक्सीजन की कमी से संघर्ष करने के लिए प्राणायाम, मानसिक शांति के लिए ध्यान-साधना, हवन-पूजन आदि विधियाँ सामूहिक रूप से की जाती हैं। भगवान शंकर की सामूहिक आराधना ही समझो। भगवान शंकर वैसे भी भोले हैं। भक्तों की ऐसी आराधना देखकर यदि वे प्रसन्न न हों तो आश्चर्य ही होगा। फिर क्या, आगे की परिक्रमा वे स्वयं ही सुगम बना देते हैं।

मानसरोवर की (बस से) एक परिक्रमा करके पवित्र मानसरोवर के पास शुभ्रा और बिपाशा दोनों बस से उतरीं। स्फटिक की तरह इतना स्वच्छ पानी की तल दिखाई दे, ऊपर निर्मल नीला आकाश और सामने साक्षात श्री कैलास! इतना रोमांचकारी दृश्य देखकर दोनों स्वयं को पूरी तरह भूल गईं। देवभूमि, स्वर्गीय शांति किसे कहते हैं, इसका प्रत्यक्ष अनुभव दोनों को हुआ। जिस यात्रा के लिए उन्होंने पूरे वर्ष तन-मन-धन लगाकर तपस्या की थी, उसका सार्थक होना अब पूर्ण हो गया था। समर्पित भाव से यहाँ आने वाला हर यात्री ऐसे ही भव्य और दिव्य अनुभव लेकर लौटता है।


यमद्वार, यहा से परिक्रमा का प्रारंभ होता है

तिब्बती बौद्ध संस्कृति में एक विशिष्ट निर्माण को यमद्वार कहते है। बाहरी परिक्रमा मार्ग पर यहीं से प्रवेश करके दिरापोख और आगे डोलमालापास तक लगभग ३६ॐ किलोमीटर की तीन दिनों की कठिन पदयात्रा शुरू होती है। बर्फ से ढका अत्यंत फिसलनभरा पथरीला रास्ता, हड्डियाँ जमा देने वाली ठंड और सांस लेने में होने वाली कठिनाई के कारण इस मार्ग की यात्रा वास्तव में एक परीक्षा जैसी होती है। जो यात्री किसी कारणवश आगे की यात्रा नहीं कर सकते, उन्हें यहाँ से लौटने से पहले कम से कम यमद्वार की प्रदक्षिणा अवश्य पूरी करनी चाहिए। यमद्वार शब्द सुनते ही वास्तव में मन में भय उत्पन्न होता है। लेकिन यहाँ यमद्वार की प्रदक्षिणा करने से जीवन के सभी भय समाप्त हो जाते हैं। भयमुक्त जीवन ही आनंद है। और यदि आगे परिक्रमा भी पूर्ण हो जाए तो वह परमानंद है। कैलास मानसरोवर परिक्रमा सफलतापूर्वक पूरी करके लौटे हमारे इन मित्रों के चेहरों पर निरंतर छलकता हुआ आनंद देखकर इस विश्वास की सत्यता का अनुभव होता है।

परिक्रमा के दूसरे दिन प्रातःकाल सूर्य की किरणों से चमकते कैलास शिखर के सौंदर्य का दर्शन करना इस तीर्थयात्रा का स्वर्णिम क्षण होता है। स्वर्णिम शिखर को देखकर आज भी यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि यहाँ श्री गौरी शंकर का निवास है। पूरे प्रवास के दौरान इस प्रकार के रोमांचकारी अनुभव लगातार मिलते रहते हैं। लौटते समय गौरीकुंड, जहाँ पार्वती ने श्रीगणेश की पहली मूर्ति बनाई थी, तथा यात्रा के प्रथम चरण में बिच्छू के आकार वाली यमुद्रोक झील, मानसरोवर के समीप स्थित राक्षसताल, अष्टपाद आदि अनेक पवित्र स्थलों के दर्शन भी होते हैं।


सूर्यकिरणों से चमकता सुवर्ण कैलास शिखर

 काठमांडू-ल्हासा विमान प्रवास के दौरान हुआ  माऊंट एव्हरेस्ट दर्शन.

तिब्बती लोगों का विनम्र स्वभाव और सेवाभावी वृत्ति मन को भावुक कर देती है। ब्रह्मा द्वारा सृजित इस विशाल और पवित्र संकल्प-भूमि के दर्शन करके लौटने के बाद मनुष्य पूरी तरह बदल जाता है। यह अनुभूति होती है कि इस सृष्टि में हम मात्र एक नाममात्र के बिंदु हैं। योगासन और प्राणायाम का महत्व पूरी तरह समझ में आता है। यात्रा के कारण ये जीवन का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे आगे का जीवन निरोगी और आनंदमय हो जाता है। विपाशा, शुभ्रा, आनंद और अंजनी ने पवित्र कैलास मानसरोवर की यह मानस यात्रा करवाई, इसके लिए उनका हृदय से आभार।

ॐ नमः शिवाय।

                                             गौरी कुंड                                      योगसाधना



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